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करहा

संत साहित्य में करहा शब्द कई अर्थों में मिलता है। ऊंट के अर्थ में, क्रिया परायण साधक के रूप में, या मन के रूप में।

संतों ने कहा कि करहे की तरह मनुष्य को राह चलते इधर-उधर मुंह नहीं मारना चाहिए, अर्थात् उसे सीधे-सीधे अपने ही साधना मार्ग में अग्रसर होना चाहिए।

गुरु रामदास ने मन को सम्बोधित करने वाले दो पदों की रचना करहले शीर्षक के अन्तर्गत की है। सरहपाद ने भी करहा शब्द का प्रयोग चित्त के लिए किया है। उनका कहना था कि चित्त रूपी करहे (जो धर्म-कर्म के विरुद्ध चलने वाला है) को यदि नियमों में बांध दिया जाय तो चंचल होकर दशों दिशाओं में भागता फिरता है, परन्तु जब इसे मुक्त कर दिया जाये, जैसा कि सरह 'खाअहु पीअहु विलसहु चंगे' में कहते हैं, तो वह स्थिर हो जाता है। परन्तु इस नासमझ क्रियापरायण (धर्म-कर्म यज्ञादि में लगे) चित्त को देखो, जो न बंध ही सका है और न मुक्त ही हो सका है। सखि मुझे यह तो ठगा हुआ सा लगता है।


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