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करभ

संस्कृत में करभ ऊंट के बच्चे को कहते हैं। परन्तु ऊंट की रास्ता चलते इधर-उधर मुंह मारने की जो प्रवृत्ति होती है उसी को आधार बनाकर संत साहित्य में मन को करभ कहा गया है।

कहा गया कि मन करभ की भांति इधर-उधर भटकता रहता है। मन की इस वृत्ति को रोककर साधक को सीधे अपने ही मार्ग कर चलना चाहिए, ऐसा संतों का मानना है।


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