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कनफटा

कनफटा गोरखपंथी या नाथपंथी योगी होते हैं। औघड़ जब एक विशेष अनुष्ठान के तहत अपने कान फड़वाकर उसमें मुद्रा (कुंडल) धारण कर लेते हैं तो वे कनफटा योगी हो जाते हैं। इस मुद्रा का एक नाम दरसनी भी है। इस अनुष्ठान के लिए प्रायः वसन्तपंचमी का दिन चुना जाता है, परन्तु यह अनुष्ठान किसी भी शुभ दिन को किया जा सकता है। उस दिन कान फड़वाकर वे मंत्र-पूत (मंत्रों से पवित्र की हुई) मुद्रा धारण करते हैं। यह अनुष्ठान पुरुष औघड़ों के लिए ही एक विशेष अघोरी अवस्था के बाद होता है। इस सम्प्रदाय में दीक्षित होने वाली विधवाएं और गृहस्थ योगियों की स्त्रियां भी मुद्रा धारण करती हैं परन्तु उनके कान नहीं फड़वाए जाते।

यह मुद्रा मिट्टी की बनी और पकायी हो सकती है और धातु की भी। हिरण के सींग, बिल्लौर या लकड़ी की भी हो सकती है।

गोरखपंथियों का कहना है कि गोरखनाथ ने सबसे पहले भर्तृहरि को कान में कुण्डल पहनवाया था। वह कुण्डल मिट्टी का बना हुआ था। यही कारण है कि भर्तृहरि के शिष्य परम्परा के तहत आज भी उनके अनुयायी मिट्टी का ही कुण्डल पहनते हैं।

नाथपंथियों में मत्स्येन्द्रनाथ और गोरखनाथ कनफटा थे, जबकि जालन्धरनाथ औघड़। कान फड़वाने की इस प्रथा को किसने चलाया था इसमें मतभेद है। कुछ का कहना है कि मत्स्येन्द्रनाथ ने चलाया था, परन्तु कुछ का मानना है कि जालन्धरनाथ ने गोपीचन्द्र के अनुरोध पर इसे चलाया था ताकि अन्य पंथों के योगियों से अलग इनकी पहचान हो। एक तीसरी धारणा भी जिसमें कहा गया कि इसे गोरखनाथ ने चलाया था। चौथी मान्यता है कि श्रीनाथ ने इसे चलाया था ताकि अवांछित या अनधिकृत लोगों को इस पंथ में आने से रोका जा सके।

जहां तक कानों में मुद्रा पहनवाने की बात है, इसे या तो मत्स्येन्द्रनाथ ने या उनके शिष्य गोरखनाथ ने चलाया था। तमिलनाडु के उत्तरी अरकाट जिले के परशुरामेश्वर मन्दिर में दूसरी-तीसरी शताब्दी की स्थापित लिंग पर भगवान शिव की बनी मूर्ति इसका प्रमाण है क्योंकि इस मूर्ति के कुण्डल वैसे ही हैं जैसे कनफटे योगी पहना करते हैं।

कनफटा योगियों का इतिहास इस प्रकार बहुत पुराना है। उनका प्राचीन गौरवपूर्ण इतिहास धीरे-धीरे कुत्सित और विकृत होता गया तथा 16वीं शताब्दी तक आते-आते तो इनका इतना पतन हुआ कि कबीर जैसे संत ने इनकी करतूतों की जोरदार निन्दा की।

सोलहवीं शताब्दी में तो कनफटा योगियों ने सैन्य बल भी गठित कर लिया था तथा सिक्खों के साथ उनका भीषण संघर्ष भी हुआ था। उसी शताब्दी में गुजरात के कच्छ के कनफटा योगियों ने अतीथों को जबरन कनफटा बनाने का अभियान भी चलाया था जिसका व्यापक प्रतिरोध हुआ। अतीथों ने इनकी शक्ति छिन्न-भिन्न कर दी थी।

आज भी कनफटा योगी पाये जाते हैं। भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के गोरखपुर शहर में इनका सबसे बड़ा केन्द्र है।


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Page last modified on Tuesday August 5, 2014 19:24:29 GMT-0000 by hindi.