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आज कथक एक सम्पूर्ण और समृद्ध कला के रूप में सामने है जिसने अपने एकल स्वरूप को बनाए रखते हुए सामूहिक संरचनाओं में भी अपना विस्तार किया है। शास्त्रीय से लेकर आधुनिक काव्य और साहित्य को अपना विषय बनाया है। जहां एक ओर तात्कालिक सामाजिक व राजनीतिक विषय भी प्रस्तुत किये गये हैं वहीं दूसरी ओर अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विदेशी कलाओं के साथ भी विचार विनिमय और आदान-प्रदान हुआ है, मिली-जुली प्रस्तुतियां हुई हैं। ठीक इसी वक्त में जरूरी है कि विचार हो, कथक की जमीन और उसके फलक का, ताकि हम कुछ ठहर कर अब तक का विस्तार परख सकें और फिर आगे बढ़ सकें।

भारतीय शास्त्रीय नृत्य विधाएं मुख्यतः एकल स्वरूप में हैं और प्रारंभ से इनका यह स्वरूप बहुत बदला नहीं है। यदा-कदा समसामयिक परिवर्तन आते रहे हैं परंतु आधारभूत स्वरूप कायम रहा है। भारतीय परम्परा शताब्दियों से चली आ रही है और आज भी अपने मूल तत्व को कहीं न कहीं थामे हुए है। परिवर्तन के साथ ही परम्परा जीवित रहती है यह विचार हमारी सभी कला परम्पराओं ने स्वीकार किया है फिर चाहे वो शास्त्रीय नृत्य हो, संगीत हो या अन्य ललित कलाएं। कथक नृत्य आज जो दिखाई दे रहा है वैसा पहले नहीं था और पिछले 30-40 वर्षों में इसमें बहुत तेजी से परिवर्तन होता दिखाई दे रहा है। इस परिवर्तन में कथक का एकल स्वरूप से समूह की तरफ बढ़ना मात्र ही नहीं है बल्कि इसके सबक, कविता, वेशभूषा, प्रस्तुतीकरण सभी में तेजी से परिवर्तन आया है। पहले से अधिक लोग इस नृत्य-विधा से जुड़े हैं, जिसने इसे एक नए किस्म का सामाजिक दर्जा भी दिलवाया है। कलाओं के संस्थागत होने के क्रम में आज कथक सीखने के अवसर पहले की तुलना में बहुत अधिक हैं। पहले से अधिक पढ़े-लिखे लोग अब नृत्य सीख रहे हैं, तो जाहिर है कि जिज्ञासाएं बढ़ेंगी, प्रश्न खड़े होंगे, पहले की तरह गुरु का शब्द अन्तिम शब्द नहीं होगा, उसपर विचार जरूरी होगा, तर्क होगा।
ये सब होते हुए भी जो नहीं बदला है वह है कथक का अस्तित्व, जो और भी सुदृढ़ हुआ है, उसके फलक का विस्तार हुआ है तथा उसकी गुरु-शिष्य परम्परा जो अब कुछ खुलापन लेकर सामने है।

कथक एक अद्भुत परम्परा है जिसका लिखित कोई इतिहास है ही नहीं। वाचिक परम्परा का इससे बेहतर और मजबूत उदाहरण मिलना कठिन है। पूरा का पूरा नृत्य वाचिक परम्परा से ही आया है और कायम है। आज जो कुछ भी लिखा हुआ मिलता है वह तुलनात्मक रूप से नया है। तो ये कहा जा सकता है कि कथक ने अपना शास्त्र खुद रचा है। इसे यों भी कहा जा सकता है कि पहले रचना अंग में हुई और फिर उसे शब्दों में बांधा गया। शायद यही वजह है कि कथक में एक ही घराने के दो गुरुजनों के नृत्य में भी फर्क नजर आता है
क्योंकि यह एक बहुत ही व्यक्तिगत शैली है। हर शिक्षक का अपना तरीका है, अपनी बन्दिशें हैं, तिहाईयों की अपनी बनावट और साहित्य की अपनी समझ है और ये उसकी पहचान भी है।

कथक के पास धरोहर के रूप में उसका नृत्य पक्ष है, बोलों का एक समृद्ध भंडार है या कहें की पूरी की पूरी व्याकरण है परंतु शब्द, वाक्य विन्यास और फिर कविता स्वयं कहनी है।
अर्थात् पुरानी बन्दिशें पास हैं जिन्हें आंगिक भाषा खुद देनी है, उसका कोई लिखित लिपिबद्ध या मुद्राबद्ध संस्करण उपलब्ध नहीं है। जहां तक साहित्य की बात है पुरानी या पारम्परिक बन्दिशें हैं जिन्हें सुर और अभिव्यक्ति अलग-अलग दी जाती है। एक ही ठुमरी या भजन के कई-कई संस्करण दिखाई देते हैं क्योंकि सब अपनी-अपनी तरह बरतते हैं। यह एक तरह की
निर्बाध स्वतंत्रता हुई जो रचनाकार को सृजन की असीमित जमीन उपलब्ध कराती है कि उसे सब कुछ नया ही रचना और गढ़ना है। यह एक सकारात्मक पक्ष हुआ। यहीं दूसरा पहलू है इस स्वतंत्रता के इस्तेमाल और फिर सही इस्तेमाल का।

कथक के एकल स्वरूप ने एक लम्बी यात्रा तय की है और मेरे विचार से आज वह अपनी यात्रा के बेहद महत्वपूर्ण और नाजुक मुकाम पर है, जहां विस्तार की अनेक संभावनाएं खुल गई हैं। दूसरी विधाओं से एक विनिमय संभव हुआ है, कलाओं का आदान-प्रदान अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हो रहा है, हर ओर से विचारों का एक समुद्र सा है जो प्रयोगकर्मियों को हर क्षण मथता
रहता है। ऐसी स्थिति में ये आवश्यक हो जाता है कि हम कहीं-कहीं ठहर कर विचार करते चलें कि हम किस ओर बढ़ रहे हैं हमारे रचनाक्रम में हमारी अपनी विधा हमें सब कुछ दे पा रही है या नहीं परिवर्तन परम्परा की परिधि को बढ़ा पा रहे हैं या पानी के बुलबुले की तरह होकर स्वतः नष्ट हो रहे हैं
क्या हम अपनी जमीन मजबूती से थामें हैं हमें जो आधार विरासत में मिला क्या उसे हम आगे आने वाली पीढ़ी के लिए धरोहर का रूप दे पा रहे हैं ये कुछ सवाल हमारी जिम्मेदारी भी बन जाते हैं, जिनके उत्तर हमारे पास होने चाहिए क्योंकि इन सवालों का सामना आज लगभग हर कलाकार को करना पड़ता है।

यह तो सच है कि कथक का जो एकल स्वरूप आज सामने है वह पहले जैसा नहीं है फिर चाहे उसे हम कथा-वाचन शैली और रास लीला में ढूंढे या फिर दरबारी बैठकों में। आज जो मंचीय शैली सामने है सौन्दर्य की दृष्टि से अपने शिखर पर कही जा सकती है। वेशभूषा और मंचीय उपकरणों ने इसके कलात्मक सौष्ठव में इजाफा किया है। अपने विषय में विस्तार के साथ-साथ आज कथक ने आधुनिक मंच व्यवस्था को भी अपनी प्रस्तुतियों में निश्चित और कहीं कहीं निर्णयात्मक जगह दी है। बिना माइक और विशेष लाइट व्यवस्था के आज बड़े-बड़े मंचों पर होने वाले कथक के एकल कार्यक्रमों की कल्पना भी नही की जा सकती।

कथक का एकल स्वरूप और उसका नृत्त पक्ष कथक की ऐसी पहचान है कि कई बार यदि नृत्त बोलों को उनके अपने तरीके से नहीं नाचा जाता तो यह सुनने को भी मिल सकता है कि कथक तो हुआ ही नहीं। अर्थात् कथक का सीधा अर्थ उसके नृत्त पक्ष से जुड़ा है। नृत्त का इस तरह विस्तार कथक को दरबारी संस्कृति के दौरान मिला। जहां एक ओर व्याकरण का विस्तार हुआ, भाषा में बदलाव आया, वहीं कथक की संतुलित प्रस्तुतियों में कमी आयी अर्थात् नृत्य और अभिनय का संतुलित मेल कहीं कहीं बिखर गया और कुछ कलाकार केवल नृत्त में ही पूरी प्रस्तुतियां करने लगे। इस वजह से कथक के अभिनय पक्ष को कमजोर माना जाने लगा जबकि कथक में अभिनय की जितनी जगह है वो अन्य शास्त्रीय नृत्यों की तुलना में काफी संतुलित है।

कथक ही एक मात्र ऐसा शास्त्रीय नृत्य है जहां नृत्त पक्ष में भी अभिनय की गुंजायश है कवित्त और गतभाव के रूप में। गतभाव कथक के एकल नृत्य का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है जहां एक ही कलाकार कई-कई चरित्र निभाता है, एक पूरी कथा पिरोता है मुद्राओं, भाव और लय के साथ बिना शब्दों का सहारा लिये। कवित्त हैं जो सम्पूर्ण कविता है, किसी पौराणिक चरित्र का वर्णन या कोई घटना सुनाती हुई। इसमें भी करने वाला एक ही व्यक्ति है और लयबद्ध यह कविता ताल के कुछ आवर्तनों में ही समाप्त हो जाती है और इस दौरान कई सारे चरित्र अलग-अलग भावों के साथ दर्शाने का प्रयास होता है। इस तरह की जटिल शास्त्रीयता कथक के एकल स्वरूप में ही संभव है। किसी भी शाब्दिक रचना को अभिनय में पिरोया जाता है तब भी खुलापन रहता है। एक पंक्ति या शब्द कितनी बार कहा जायेगा ये पहले से निश्चित हो ये जरूरी नहीं है, तात्कालिक मूड पर निर्भर करता है या कलाकार किसी शब्द या पंक्ति को कितनी अलग-अलग तरह से सोचकर दिखा सकता है इस पर निर्भर करता है। प्रदर्शन के दौरान ही नर्तक/नर्तकी और गायक कलाकार के बीच ऐसा तारतम्य हो जाता है कि बस आंख के एक इशारे से पंक्ति बदलनी है ये भान हो जाता है। परंतु इस जटिल शास्त्रीयता को निभाने और बरतने के लिये कलाकार को बहुमुखी होना होता है। उसे नृत्य के अतिरिक्त उसके संगीत, कविता, दर्शन, पौराणिक धरोहर तथा अन्य ललित कलाओं का ज्ञान भी आवश्यक है। क्योंकि कोई भी कला अकेली पूर्ण नहीं होती वो दूसरी कलाओं को किसी न किसी रूप में अपने साथ रखती चलती है।

कथक सीखते हुए सबसे पहले जिस ओर ध्यान जाता है वो है उसके साथ बजने वाला ठेका और लहरा। शुरु से ही लहरा और ताल की संगत होनी जरूरी है केवल मात्राओं से काम नहीं चलता। माना ये जाता है कि कथक सीखने वाले को तबला या पखावज का ज्ञान, उस पर अलग-अलग तालों के ठेके बजा पाना और हारमोनियम पर अलग-अलग तालों के लहरे बजाना आना चाहिए। तो यों आरंभ से ही नृत्य, ताल और सुर की संगत लेकर चलता है।
लहरा जो एक विशिष्ट स्वरबद्ध रचना है तालों का आकार दिखाता है और ताल-वाद्य नृत्य के बोलों को। इस पृष्ठभूमि पर खड़ी होती है कथक नृत्य के बोलों की इमारत अर्थात् किसी भी अन्य भाषा की तरह कथक को प्रारंभ के अक्षरज्ञान से सीखना होता है एकदम व्याकरण ज्ञान की तरह। व्याकरण या नृत्त पक्ष सीखकर ही आगे संरचनाओं की ओर बढ़ा जा सकता है। ये संभव नहीं है कि कहीं भी मध्य से कोई एक या दो आइटम सीख लिये जायें, क्योंकि कथक को छोटी-छोटी प्रस्तुतियों या आइटम में नहीं सीखा जा सकता, पूरी की पूरी भाषा ही सीखनी होती है, यही वजह है कि कथक सीखने वालों में प्रगति तुलनात्मक रूप से धीमी नजर आती है।

यों तो सभी शास्त्रीय नृत्य मेहनत और लगन के बिना संभव नहीं है परंतु कथक की अपनी चारित्रिक विशेषताओं के रहते तथा उसका पैरों का काम या तत्कार अलग तरह की मेहनत की मांग करते हैं। कुछ वर्ष लग जाते हैं पैरों से दु्रत लय में देर तक सधी हुई तत्कार कर पाने में, हर बोल पैरों से साफ-साफ अदा होने में, अंग के साथ-साथ बोलों का पैरों से निकास होने में। और फिर चक्कर जो एक दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा है उसे भी साधना होता है। ये सब मेहनत कथक की प्रभावी प्रस्तुतियों को देखकर सीखने आये लोगों को निराश करती है।

इसके अतिरिक्त वर्षों तक सीख लेने के बाद भी एकल नृत्यकार अपनी पहचान नहीं बना पाते क्योंकि एकल प्रस्तुतियों में रचनात्मक होना बेहद जटिल काम है। स्वयं को दोहराव से बचा लेना, पारम्परिक प्रस्तुतियों में भी हर बार नयापन ले आना कठिन कार्य है क्योंकि एकल कलाकार रचनात्मक कार्य तभी कर सकता है जबकि उसकी व्याकरण पर पूरी पकड़ हो अन्यथा रचना होगी कैसे बोल तो गढ़ने होंगे, एक बोल से दस अन्य बोल निकाल पाने की क्षमता होगी तभी तो सृजन हो पायेगा। यहां विषय कुछ भी हो निभाने वाला एक ही है, तो यह स्थिति विषय और प्रस्तुति को जटिलता देती है। वहीं विषय जो भी हो, जब समूह हो तो प्रस्तुत करने में तुलनात्मक रूप से आसानी हो जाती है।


जहां एकल में नृत्यकार अपनी कल्पना को कई बार कल्पना के रूप में ही रख पाता है वहीं सामूहिक रचना में उसे हूबहू दिखा पाना संभव हो जाता है। कृष्ण, राधा को सोच रहे हैं और एकल प्रस्तुति है तो कलाकार और दर्शक दोनों ही राधा की बस कल्पना करते हैं वहीं समूह संरचना में कृष्ण की कल्पना साकार दिखाने की सुविधा मिल जाती है। देखा जाये तो यह आसानी हुई। जहां एकल नृत्य जटिलताओं में सौन्दर्य की सृष्टि करता है वहां सामूहिक नृत्य रचनाएं जटिलताओं को खोलती चलती हैं। इसके अतिरिक्त समूह संरचनाएं एक से अधिक कलाकारों को एक साथ मंच दे पाती है। एकल प्रस्तुति दक्षता की मांग करती है और उस परिपक्वता तक पहुंचने के लिये अन्ततः धैर्य और कड़ी मेहनत ही एकमात्र रास्ता हो सकता है। यही वजह है कि आज एकल कलाकार कथक में कम दिखाई दे रहे हैं, नयी प्रतिभाएं हैं तो, पर मंच पर पहुंचने की जल्दी उन्हें दक्ष होने से कई बार रोक देती है।

समूह नृत्य में जहां कुल मिलाकर विषय और नृत्य संरचना प्रमुख है प्रत्येक कलाकार का उस तरह दक्ष होना जरूरी नहीं भी होता है, यदि हो तो रचना निखरकर आती है परंतु समूह में व्यक्तिगत कमजोरियां आसानी से नजर नहीं आतीं। यही कारण है कि कई युवा कलाकार जहां समूह में निखर कर आते हैं एकल प्रस्तुतियों में पिछड़ जाते हैं। यहां तक कि ऐसे उदाहरण भी हैं जहां कुछ कलाकारों में एकल प्रस्तुत होने का हौसला ही नहीं होता जबकि समूह में बेहतरीन प्रदर्शन कर पाते हैं, ऐसा क्यों क्या इसके लिये शिक्षण पद्धति जिम्मेदार है या फिर एकल नृत्यकार बनाने के लिए किसी विशेष शिक्षण पद्धति का होना आवश्यक है क्योंकि आखिर सभी लोग कथक को सीखते तो एकल स्वरूप में ही हैं फिर वे उसे एकल कलाकार बनने में बरते या समूह में ये स्वतंत्रता कलाकार या छात्र की अपनी है।


आज अधिक से अधिक कथक कलाकार सामूहिक संरचनाएं करने का प्रयत्न करते हैं बजाय एकल प्रस्तुतियों के। बिना इस ओर ध्यान दिये कि नृत्य-संयोजन कठिन विधा है जिसे भी सीखना और समझना आवश्यक है। हर दूसरा कथक कलाकार कोरियोग्राफी करता नजर आता है। एक के बजाय चार या उससे अधिक लोगों का एक साथ नाच भर लेना ही कोरियोग्राफी नहीं है, इसे समझना भी जरूरी है। विषय वस्तु से लेकर वेशभूषा तक हर पक्ष नृत्य संरचना के अनुकूल और थीम की अभिव्यक्ति में सहायक हो, इस सबका ध्यान रखना आना चाहिए, परंतु वर्तमान में इस तरह की उत्कृष्ट प्रस्तुतियां कथक में कम देखने को मिलती हैं। श्रीमती कुमुदिनी लाखिया और श्री बिरजू महाराज का योगदान कथक के सामूहिक नृत्य संरचनाओं के लिए स्थाई और बेहद महत्वपूर्ण माना जा सकता है, जिसने कथक को एक नया विस्तार और दिशा दी।
कथक की शास्त्रीय केन्द्रीयता उसके एकल स्वरूप में ही है और अगर कोई भी नया प्रयोग या विस्तार इस केन्द्रीयता को क्षति पहुंचाता है तो इससे कथक का असली स्वरूप ही खतरे में पड़ जायेगा।