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एकावली

साहित्य में एकावली एक अर्थालंकार है जिसमें श्रृंखलारूप में कई चीजों के प्रति किसी गुण-दोष आदि का वर्णन करते हुए विशेष्य-विशेषणभाव सम्बंध से किसी तथ्य को स्थापित या निषिद्ध किया जाता है।

देखें विशेषणभाव से स्थापना का उदाहरण जिसका प्रयोग गुप्त जी ने किया था -

वृन्दावन में नव मधु आया, मधु में मन्मथ आया।
उसमें तन, तन में मन, मन में एक मनोरथ आया।

निषेध का उदाहरण केशवदास के इस सवैये में देखें -
सोहत सो न सभा जहं वृद्ध न, वृद्ध न ते जु पढ़े कछु नाहीं।
दन न सो जहं सांच न केसव, सांच न सो जु बसै छल छांही।


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