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उर्दू साहित्य

वह साहित्य जो उर्दू भाषा में लिखा गया उसे उर्दू साहित्य कहते हैं।

उर्दू साहित्य की नींव अमीर खुसरो (1255-1325) ने डाली, जिन्होंने इस भाषा को देहलवी या हिन्दवी कहा था। फारसी के इस प्रसिद्ध शायर ने हिन्दवी में पहेलियां, दोहे, चौपाइयां और शेर लिखे। उन्होंने ऐसी गजलें भी लिखी थीं जिनमें एक बोल तो फारती का है और दूसरा हिन्दवी का। वास्तव में उनकी भाषा में अनेक भाषा और बोली के शब्द शामिल हुए, जिसके कारण उस भाषा को रेखता कहा गयी जिसका अर्थ होता है अनेक चीजों का मिश्रण।

रेखता की उत्पत्ति का कारण रहा मुहम्मद गोरी का 1199 में दिल्ली पर विजय। कुतुबुद्दीन ऐबक ने जब यहां का शासन संभाला था तो उस समय लाहौर, जो अब पाकिस्तान में है, में फारसी और पंजाबी शब्द बोलचाल में आ चुके थे। उसके बाद ब्रजभाषा, हरयाणवी, राजस्थानी आदि भाषाएं भी खड़ी बोली में घुल-मिल गयीं तथा इस तरह एक नयी प्रकार की भाषा का जन्म हुआ। मिश्रित भाषा होने के कारण ही इसे रेखता कहा गया।

कुतुबुद्दीन ऐबक स्वयं सूफी थे, इसलिए दिल्ली धीरे-धीरे सूफियों का केन्द्र बन गया। इन सूफियों ने धर्म प्रचार के लिए हिन्दवी का ही प्रयोग किया क्योंकि स्थानीय लोगों तक पहुंच के लिए यही भाषा उपयुक्त थी।

अलाउद्दीन खिजली के गुजरात और दक्कन पर विजय पाने के बाद सूफियों के माध्यम से उधर भी हिन्दवी पहुंची।

ख्वाजा गेसू दराज ने मेराजुलआशिकीं लिखी जो उर्दू की पहली गद्य की पुस्तक बनी। सूफियों का फैलाव पूरे देश में होने के कारण हिन्दवी पूरे देश में फैली। वे फारसी के साथ-साथ स्थानीय शब्दों का भी काफी प्रयोग करते थे। भारतीय विचारों को भी उन्होंने शामिल किया। सन् 1490 तक दक्षिण भारत के बीजापुर तथा 1518 तक गोलकुंडा हिन्दवी के केन्द्र बन गये थे।

गोलकुंडा के कुतुबशाही वंश के चौथे राजा मुहम्मद कुली कुतुब शाह (1580-1611) का हिन्दवी में साहित्य मिलता है।

बीजापुर के शाही संरक्षण में मुकीमी, रुस्तमी, नुसरती आदि प्रसिद्ध कवि हुए जबकि गोलकुण्डा में पजही, गब्बासी और इब्नेनिशाती आदि। इन कवियों के कारण देहलवी की एक भिन्न दक्कनी शैली का जन्म हुआ।

वैसे गुजरात, काठियावाड़ और आसपास के इलाकों में देहलवी की गुजराती शैली का भी जन्म हुआ। इसका कारण था 1398 में तैमूर के हमले के कारण सूफी कुतबुल आलम और शेख अहमद का गुजरात चला जाना। इस शैली की प्रसिद्ध रचनाएं हैं मुहम्मद हुसैन 'खूब' की 'खूब तरंग' तथा अमीन की 'यूसुफ-जुलेखा'।

मुगल शासन में हिन्दवी में फारसी के शब्द बड़ी संख्या में आये तथा हिन्दवी के विकास के साथ ही इस भाषा का नाम रेखता पड़ गया। यह रेखता शाहजहां के शासनकाल में उर्दू कही जाने लगी। यह अलग बात है कि 1857 में भारत में मुगल वंश के शासन की समाप्ति तक रेखता शब्द का भी उपयोग हो रहा था।

वली औरंगावादी जब दक्षिण भारत से शाहजहांनाबाद (दिल्ली) आये तब एक बुजुर्ग सूफी शेख सादुल्लाह 'गुलशन' ने उन्हें फारसी परम्पराओं का उर्दू में प्रयोग करने के लिए कहा। उर्दू की दक्कनी शैली के महारथी वली ने इन निर्देशित तर्ज पर जब शेर कहे तो लोगों को बहुत पसंद आया। फिर क्या था सभी ने उसी रास्ते पर चलना प्रारम्भ किया। हातिम, फायना, आबरू, मजहर आदि अनेक लेखकों और शायरों ने फारसी की तर्ज पर रेखता के गद्य और पद्य दोनों को एक स्थिर स्वरूप दिया।

उर्दू साहित्य का अगला दौर मीर, सौदा, दर्द आदि शायरों के साथ आया। यह दौर उर्दू साहित्य का स्वर्णयुग बन गया। दिल्ली में सामाजिक स्थितियां अच्छी नहीं थीं जिसके कारण मीर, सौदा आदि बहुत से शायर दिल्ली से भागकर लखनऊ चले गये जहां स्थितियां बेहतर थीं। इंशा, मुसहफी, नासिख, आतश आदि मशहूर गजलकार लखनऊ में ही हुए।

लखनऊ में एक विशेष बाद हुई। मीर हसन ने जहां मसनवी में अपनी तेजस्विता का परिचय दिया वहीं मरसिये में जमीर, अनीस, दबीर आदि ने फारसी परम्परा से हटकर एक विशेष प्रकार के साहित्य को जन्म दिया। इमाम हुसैन के बलिदान को महाकाव्य की तरह वर्णित किया गया, भाषा का क्षेत्र और विषय विस्तार हुआ, यह और प्रांजल और मीठी हुई। अवध के नवाब वाजीदअली शाह का उर्दू साहित्य के प्रति बड़ा योगदान रहा। उन्होंने 75 छोटी-बडी पुस्तकें लिखीं। अमानत ने इन्दर सभा नामक उर्दू का पहला नाटक लिखा।

उधर दिल्ली में जौक, मोमिन और गालिब ने उर्दू काव्य को दार्शनिक स्तर तक पहुंचाया। गालिब (1797-1869) का बड़ा योगदान रहा। उन्होंने भावना और आध्यात्मिक विचारों के अतिरिक्त दार्शनिक तत्वों को अपने गजल में शामिल किया।

दिल्ली और लखनऊ के बाद कोलकाता भी उर्दू के विकास का केन्द्र बना। वहां फोर्ट विलियम कालेज के हिन्दुस्तानी विभाग में सरल उर्दू भाषा की नयी शैली के प्रचार के लिए विशेष गद्य लेखन कार्य चलाया जा रहा था।

उर्दू में पत्रव्यवहार का सिलसिला इसी समय से चला। इसके पूर्व फारसी में ही पत्रव्यवहार होता था।

1857 के भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की विफलता के बाद की सामाजिक स्थितियां बदलीं तथा अंग्रेजों और अंग्रेजी का प्रभुत्व बढने से उर्दू साहित्य पर भी इसका प्रभाव पड़ा। सर सैयद अहमद खां (1817-1895) ने अलीगढ़ साइंटिफिक सोसाइटी का गठन कर उर्दू में साहित्य सृजन को आगे बढ़ाया। फिर उर्दू में पश्चिमी विचारों का प्रभाव पड़ा।

मिरातुल अरुस (दूल्हन का आइना) नामक उर्दू का पहला उपन्यास 1839 में आया था जिसके लेखक थे नजीर अहमद (1831-1912)।

उधर लाहौर में 1867 में अंजुमन-ए-पंजाब का गठन हुआ। उसका गठन मुहम्मद हुसैन 'आजाद' के प्रयासों से हुआ था। इसी अंजुमन के नेतृत्व में 1874 के बाद वैसे मुशायरे होने लगे जिनमें विषय दिया जाता था और कवि उसी विषय पर कविता करके सुनाते थे। इसके कारण उर्दू में नयी कविता का जन्म हुआ। इकबाल (1875-1938), जोश, जफरअली खां आदि इसके बड़े कवि हुए।

उसके बाद भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में उर्दू साहित्य का काफी योगदान रहा। बड़ी संख्या में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध साहित्य लिखे गये।

1918 में पहले विश्वयुद्ध की समाप्ति और रूसी क्रांति का असर भी उर्दू पर पड़ा।

रूमानी उर्दू साहित्य का भी एक दौर चला जिसमें अख्तर शीरानी और सज्जाद हैदर जैसे उर्दू लेखक शामिल हैं।

उर्दू साहित्य में प्रगतिवाद का प्रारम्भ 1935 से हुआ। प्रगतिवाद के दौर में उर्दू के चोटी के लेखकों में लगभग शत-प्रतिशत प्रगतिवादी ही रहे। कहानी, कविता, उपन्यास, समालोचना आदि का विस्तार हुआ। उर्दू का ऐसा प्रचार हुआ की बाजार से लेकर फिल्मों तक में उर्दू का साम्राज्य सा हो गया। वैज्ञानिक और अन्य उपयोगी तथा पाठ्यक्रम सम्बंधी पुस्तकों का व्यापक रूप से अनुवाद भी हुआ और एक समय तो ऐसा आया जब हैदराबाद और दिल्ली के जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर तक सभी विषयों के लिए पढ़ने-पढ़ाने का माध्यम उर्दू हो गया।

भारत की स्वतंत्रता की घोषणा के बाद भारत और पाकिस्तान में भीषण हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए जिसका असर उर्दू के लेखकों और कवियों पर पड़ा। उन्होंने दंगे के विरोध में बेहतरीन साहित्य की रचना की। इस दौर के प्रमुख उर्दू रचनाकार हैं - कृष्णचन्दर, मंटो, ख्वाजा अहमद अब्बास, इस्मत चुगताई, जोश, सरदार जाफरी, वामिक आदि।

महात्मा गांधी की हत्या के बाद शांति स्थापित करने के अभियान में भी उर्दू साहित्य का योगदान रहा।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उर्दू साहित्य का नया दौर चला। आधुनिकता, अत्याधुनिकता और उत्तरआधुनिकता का प्रकटीकरण इस दौर का प्रमुख रूझान है।


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