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उपयोगी साहित्य या शास्त्र

उपयोगी साहित्य वह साहित्य है जिसका उपयोग मनुष्य अपने जीवन में करता है। प्रचीन काल में ऐसे ही साहित्य को शास्त्र कहा जाता था। वास्तव में साहित्य (रूढ़ अर्थ में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध आदि) से अलग, अर्थात् जो साहित्येतर साहित्य है वही उपयोगी साहित्य या शास्त्र कहा जाता है।

शास्त्र दो प्रकार के होते हैं - पौरुषेय तथा अपौरुषेय।

पौरुषेय शास्त्र चार हैं - पुराण, आन्वीक्षिकी या न्याय, मीमांसा तथा स्मृतितंत्र।

अपौरुषेय शास्त्र 10 हैं - चारों वेद और छः वेदांग।

इन्हीं शास्त्रों को विद्यास्थान कहा जाता है। इस प्रकार विद्यास्थान भी 14 हुए।

परन्तु कुछ अन्य विद्वान विद्यास्थानों की संख्या 18 बताते हैं। इसमें उन्होंने चार अतिरिक्त विद्यास्थान जोड़े हैं। ये हैं - वार्ता, कामसूत्र, शिल्पशास्त्र और दण्डनीति।

वार्ता (वाणिज्य-कृषिविद्या), कामसूत्र, शिल्पशास्त्र तथा दण्डनीति के सम्मिलित सारांश को साहित्यविद्या कहा जाता है।

आधुनिक युग में जो उपयोगी साहित्य है उसका विस्तार हुआ है। आज वैज्ञानिक, तकनीकी, मनोवैज्ञानिक, राजनीति, अर्थ, धर्म आदि के अनेक शास्त्र या उपयोगी साहित्य मिलते हैं।


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