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उदारवाद

उदारवाद एक मत है जो व्यक्ति तथा समूहों को उनके विकास के लिए अधिकतम स्वतंत्रता देने का पक्षधर है। यह मत समाज के पूर्ण अंकुश को वह व्यक्ति या समूहों के लिए कुछ ढीला करने की वकालत करता है।

यह मत समाज तथा व्यक्ति में एक समन्वय स्थापित करने के पक्ष में है। इसका मानना है कि व्यक्ति पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हो सकता तथा समाज भी पूरी तरह निरंकुशता का रूख नहीं अपना सकता।

उदारवाद वैसे तो आधुनिक अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों की उपज है, परन्तु इसके बीज प्रचीनकाल से ही मिलते हैं जिसमें व्यक्तियों या समाजों के प्रति उदारता बरतने की भावना को प्रोत्साहित किया गया है।

आजकल दो प्रकार के उदारवाद चल रहे हैं - आर्थिक उदारवाद तथा सामाजिक उदारवाद।

आर्थिक नियमों की कठोरता से आर्थिक गतिविधियों को मुक्त करने को आर्थिक उदारवाद कहा जाता है तथा समजिक नियमों की अठोरता से व्यक्ति को राहत देने को सामाजित उदारवाद कहा जाता है।

आर्थिक उदारवाद में व्यापार-स्वतंत्रता तथा मुक्त प्रतियोगिता को प्रश्रय दिया जाना अभिहित है जबकि सामाजिक उदारता में व्यक्ति को अपने ढंग से जीवन जीने देने को बढ़ावा दिया जाता है।

सरकार और समाज से अपेक्षा की जाती है कि वे लोगों की आर्थिक और व्यक्तिगत गतिविधियों में न्यूनतम हस्तक्षेप करें।

इसके लिए दुनिया भर के कानूनों में लगातार संशोधन किये जा रहे हैं। समाज और राज्यों का कितना अंकुश रहे इसपर लगातार चिंतन हो रहे हैं।

उदारवाद के गुण-दोषों पर लगातार मंथन भी हो रहा है। इस उदारवाद के अनेक दुष्परिणाम भी सामने आये हैं, जिसमें प्रमुख है व्यक्तियों का संयमहीन होकर वैसे कार्य करना जिनसे उनके अपने स्वार्थ की पूर्ति तो होती है, परन्तु समाज का व्यापक अहित होता है। इस उदारवाद के कारण समाज के प्रति गैरजिम्मेदार लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इस उदारवाद के कारण व्यक्तिगत जीवन पतनशील होता गया है तथा आर्थिक स्वेच्छाचारिता बढ़ती गयी है।

चिंतक इस उदारवाद पर नये सिरे से सोचने पर बल देने लगे हैं।


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Page last modified on Thursday July 31, 2014 06:01:43 GMT-0000 by hindi.