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उत्प्रेक्षा

उत्प्रेक्षा एक अलंकार है। उत्प्रेक्षा तब होती है जब प्रस्तुत में अप्रस्तुत की संभावना होती है। इसमें विशेष गुणसाम्य नहीं होता बल्कि क्रिया योग होता है। इसमें कही हुई बात से अलग किसी और बात की संभावना होती है।

विश्वनाथ ने अपने साहित्यदर्पण में इसके दो भेद बाताये हैं - वाच्या तथा प्रतीयमाना। परन्तु अनेक अन्य विद्वानों ने इसके चार भेद बताये हैं। ये हैं - वस्तूत्प्रेक्षा, हेतूत्प्रेक्षा, फलोत्प्रेक्षा, तथा वाच्या और प्रतीमाना।


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