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उत्तर

साहित्य में उत्तर एक अर्थालंकार है। यह प्रश्नोत्तर भी हो सकता है और मूढ़ोत्तर भी।

मम्मट ने इसकी परिभाषा देते हुए कहा, “उत्तर अलंकार में या तो उत्तर के सुनने भर से प्रश्न की कल्पना कर ली जाती है या प्रश्न के रहते हुए भी ऐसे उत्तर की कल्पना कर ली जाती है जिसकी सामान्यतः कोई सम्भावना नहीं होती"।

कुवलानन्द ने कहा कि उत्तर अलंकार तब होता है जब उत्तर से प्रश्न का अनुमान किया जाये या अनेक प्रश्नों से अनेक असंभावित उत्तर कहे जायें। इसे उन्होंने गूढ़ोत्तर कहा। जसवंत सिंह, भूषण तथा दास आदि ने भी इसे गूढ़ोत्तर भी कहा।

उत्तर अलंकार दो प्रकार के होते हैं - प्रथम उत्तर तथा द्वितीय उत्तर।

प्रथम उत्तर वह है जिसमें उत्तर के आधार पर प्रश्न का अनुमान किया जाता है।

द्वितीय उत्तर वह है जिसमें प्रश्न में ही उत्तर तथा अनेक प्रश्नों के एक ही उत्तर होते हैं।


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