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आवृत्तिवाद

आवृत्तिवाद एक मत है। इसके मतावलम्बी इस बात पर विश्वास करते हैं कि किसी भी समाज तथा संस्कृति में प्रतिभावों का उद्भव समुदाय के रूप में होता है। ऐसे प्रतिभा समुदायों की आवृति होती है। समाज में ऐसा दौर आता है।

उदाहरण के लिए भारतवर्ष में ईसा पूर्व 800 से 500 की अवधि को लिया जा सकता है। यह वह युग था जब भगवान महावीर, भगवान बुद्ध, उपनिषदों के रचयिता आदि अनेक प्रतिभावान लोग आये। ऐसी ही युग की पुनरावृत्ति लगभग 700 वर्ष बाद हुई जब विक्रमादित्य, भास्कराचार्य, आर्यभट्ट, कालिदास आदि अनेक प्रतिभावान लोग आये। यह युग भी आठवी शताब्दी तक रहा। उसके बाद पुनः लगभग 700 वर्षों के अन्तराल में ऐसा युग आया जिसमें भक्ति आन्दोलन चला, तथा कबीरदास, सूरदास, तुलसीदास, मीरा, गुरुनानक आदि अनेक प्रतिभावान लोग आये। इसमें ध्यान देने वाली बात यह है कि लगभग 700 वर्षों के अन्तराल में ऐसा दौर आता रहा है। यदि भारतीय इतिहास में ईसा पूर्व 800 से 700 वर्ष पहले की अवधि देखें तो स्पष्ट है कि ईसा पूर्व 1800 से 1500 की अवधि वैदिक काल के रूप में विख्यात है।

यूरोप, अमेरिका आदि में भी ऐसे दौरों की आवृत्तियां होती रही हैं।

यही कारण है कि आवृत्तिवादी विचारधारा में किसी भी समाज या संस्कृति के उत्तरोत्तर विकास या पतन की परिकल्पना को गलत माना जाता है। उनके अनुसार प्रगति तथा पतन के युगों की आवृत्तियां होती रहती हैं।

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