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आनंद


आनंद सुख-दुख के द्वंद्व से परे वह अवस्था है जिसमें शरीर और मन विषयी नहीं रह जाता। अपने आप में स्थित रहने की अवस्था ही आनन्द की अवस्था है, अर्थात् शरीर और मन के विचलन से मुक्त रहने की अवस्था, जीवन के अन्तर्लय में बने रहने की अवस्था। सुषुप्ति की अवस्था एक उदाहरण के रूप में है जब शरीर और मन विषयी नहीं रह जाता, तथा व्यक्ति आनन्द में रहता है। इस आनन्द का अनुभव किसे नहीं है! आनन्द की ऐसी ही अवस्था जाग्रत स्थिति में तब आती है जब व्यक्ति की विषयी अवस्था नहीं रहती, अर्थात् जब वह विषयभोग से परे चला जाता है, और तब उसी क्षण वह सुख-दुःख से परे आनन्द की अवस्था में प्रवेश कर जाता है। कहते हैं योगी की अवस्था उसी अनन्द की अवस्था हो जाती है क्योंकि वह भी योगस्थ अवस्था में विषयों तथा विषयभोगों से परे अवस्थित रहता है।

आनन्द को नित्य माना गया है। यह व्यक्ति में हर अवस्था में कुछ न कुछ रहता है। अत्मा का यही स्वभाविक लक्षण है। दुःख तो उपलक्षण है जो अनित्य है, आता है और जाता है।

सुख और आनन्द में अन्तर

आनन्द सुख की तरह सातिशय नहीं बल्कि निरतिशय है। आनन्द सुख की तरह क्षणिक नहीं बल्कि नित्य है, परिवर्तनशील नहीं बल्कि स्थिर है। सुख का सम्बंध शरीर और इन्द्रियों से है, परन्तु इससे अलग आनन्द एक रसानुभूति है जो इन्द्रियों से परे आत्मा में स्थित है। इस प्रकार आनन्द सुख की तरह सांसारिक नहीं बल्कि अलौकिक है। आनन्द आत्मनिर्भर है, तथा सुख आनन्द पर। आनन्द श्रेयस की प्राप्ति कराता है न कि सुख की तरह प्रेयस की। आनन्द का सत्गुण से कभी विरोध नहीं होता जबकि सुख सत्गुण के विपरीत कर्मों से भी हो सकता है।

भारतीय दर्शन में आनंद

भारतीय दर्शन परम्परा में आनन्द आत्मा का स्वाभाविक गुण है क्योंकि यह उसके तीन स्वरुपों में से एक है। दो अन्य हैं सत् और चित्। यह आत्मा का ही स्वरूप है इसलिए सत् तथा चित् की तरह यह भी नित्य है।

तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा गया है कि वह तो रस ही है। वृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया कि इस आनन्द के अंशमात्र के आश्रय से ही सभी प्राणी जीवित रहते हैं। यहां आकर आनन्द परब्रह्म का वाचक ही हो जाता है। तैत्तिरीय उपनिषद् इसे और आगे ले जाता है और कहता है कि आनन्द ही जगत का कारण, आधार और लय है।

आनन्द आत्मा का स्वाभाविक गुण है। इसलिए व्यक्ति आनन्द की प्राप्ति का प्रयत्न करता रहता है तथा मायावी सुख के फंदे में फंसकर घोर दुःख पाता है।

जबतक दो या द्वैत, जीवात्मा और परमात्मा, को बोध रहता है तब तक व्यक्ति में एक भय बना रहता है, इसलिए उसे आनन्द की प्राप्ति नहीं होती। जैसे ही व्यक्ति योगस्थ हो जाता है, अत्मा और परमात्मा में भेद का भान नहीं रहता, तथा व्यक्ति आनन्द की अवस्था में स्थित हो जाता है।

आध्यात्म में इसी आनन्द की अनुभूति की जाने की बात कही गयी है, जिसे प्राप्त कर लेने वाला व्यक्ति संसार के अन्य सभी सुखों को तुच्छ समझता है।

माना जाता है कि यह आनन्द आत्मज्ञान से आता है और इसकी प्राप्ति ही मोक्ष माना जाता है। आनन्द को ही एकमात्र और परम मूल्य माना गया है।

चार आनंद

भारतीय चिंतन परम्परा के वज्रयानी सिद्धों ने बार-बार चार आनन्दों की बात की है। वे चार क्षणों की बात करते हैं - विचित्र, विपाक, विमर्द, तथा विलक्षण। इन्हीं चार क्षणों के भेद से चार आनन्द बताये गये हैं। ये हैं - प्रथमानन्द, परमानन्द, विरमानन्द तथा सहजानन्द।

प्रथमानन्द विचित्र क्षण में अनुभूत की जाती है। यह उस आनन्द से मिलती-जुलती है जो आलिंगन, चुंबन आदि के समय व्यक्ति अनुभव करता है। यहीं पर व्यक्ति भटक जाता है तथा ज्ञानेन्द्रियों के सुख को ही गलती से आनन्द समझ बैठता है।

विपाक के क्षण में परमानन्द की अनुभूति होती है जो ज्ञान-सुख योग से प्राप्त सुख की तरह है, जबकि विमर्द के क्षण में विरमानन्द की प्राप्ति होती है जो समागम सुख की भांति है।

राग और विराग से जब व्यक्ति ऊपर उठ जाता है तब साधक विलक्षण क्षण में प्रवेश करता है और तब उसे सहजानन्द की अनुभूति होती है। यही साधक को महासुख की अनुभूति देता है।