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अहम्

अहम् का सामान्य अर्थ है मैं। परन्तु दर्शन में अहम् शब्द का व्यापक अर्थ होता है। वेदान्तदर्शन में इसी अहम् को व्यावहारिक, अविद्या से सीमित, अनात्म से एकीकृत आत्मा माना गया है। उसके अनुसार यही मैं और मेरा की भावना सृजित करती है।

प्राचीन और पारम्परिक भारतीय चिन्तन में कहा गया कि इसी से अहंकार तथा ममता का सृजन भी होता है।

पाश्चात्य मनोविश्लेषक फ्रायड के आने के बाद उनकी विचारधारा के लोग उनके ईगो को ही अहम् कहते हैं। इस आधुनिक विचार में भी अहम् को अधिकांशतः जीव का चेतन स्वरुप ही माना गया है। यह अलग बात है कि यही अहम् अचेतन या अवचेतन रूप से भी सक्रिय रहता है। न्यूनतम संकट झेलकर वासनाओं की तृप्ति की चिंता इसी अहम् के लिए अभिहित किया गया। इस अर्थ में अहम् मनुष्य का बौद्धिक तथा व्यावहारिक पक्ष है।


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