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असमिया साहित्य

असमिया भाषा में लिखे जाने वाले साहित्य को असमिया साहित्य कहा जाता है।

असमिया साहित्य का उद्भव तेरहवीं शताब्दी से माना जाता है। इसका प्रारम्भिक रूप चर्यापद के दोहों में मिलता है, अर्थात् छठी शताब्दी से दसवीं शताब्दी के बीच। बारहवीं शताब्दी के अन्त तक लोक गाथाओं, गीतों आदि मौखिक रूप में ही यह था। मणिकोंवर-फुलकोंवर गीत एक पारंपरिक लोक गाथा ही है। डाक-वचन, तंत्र-मंत्र आदि भी मिलते हैं। परन्तु ये स्रोत मात्र हैं। वास्तव में असमिया लिखित साहित्य तेरहवीं शताब्दी से ही मिलता है।

सन् 1200 से 1449 ईस्वी तक के साहित्य को प्राक्वैष्णवकालीन साहित्य कहा जाता है। सन् 1450 से 1650 के बीच के साहित्य को वैष्णवकालीन साहित्य नाम दिया गया है। सन् 1651 से 1925 तक के साहित्य को गद्य या बुरंजीकालीन साहित्य के नाम से जाना जाता है तथा उसके बाद प्रारम्भ होता है असमिया साहित्य का आधुनिक काल जो 1947 में भारतवर्ष के स्वतंत्र होने तक चला। उसके बाद के साहित्य को स्वातंत्र्योत्तर काल का साहित्य कहा जाता है।

प्राक्वैष्णवकाल में दो प्रकार के साहित्यकार हुए। एक वे थे जिन्होंने या तो संस्कृत ग्रंथों का अनुवाद किया या उनके पात्रों के आधार पर नयी रचानाएं रचीं। अधिकांश रचनाएं धार्मिक तथा भक्ति साहित्य की प्रकृति के थे। दूसरे प्रकार के साहित्यकार कवियों ने वीरों के महाकाव्य रचे। उपलब्ध रचानाओं में 'प्रह्लाद चरित्र' प्रथम असमिया ग्रंथ है जिसकी रचना कवि हेम सरस्वती ने की थी। तेरहवीं शताब्दी के ही एक अन्य साहित्यकार थे पश्चिम कामरूप के कमतापुर के राजा दुर्लभ नारायण। माधव कन्दली इस काल के सबसे बड़े कवि थे जिन्होंने रामायण का असमिया में काव्यात्मक अनुवाद किया था। दुर्गावर, पीताम्बर तथा मनकर ने गीतिकाव्य की रचनाएं कीं। दुर्गावर ने रामायण को असमिया गीतों में ढाला तो पीताम्बर तथा मनकर ने क्रमशः ऊषा-परिणय तथा बेउला लखिन्दर नाम से प्रणय-काव्यों की रचना की। इसी अवधि में पारंपरिक तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, मनसा पूजा, भूत-पिशाच से मुक्ति के मंत्र, रोग-निवारण तथा सर्पविष उतारने के मंत्र आदि भी लिखित रूप में आये।

वैष्णवकाल में शंकरदेव जैसे कवि तथा धर्मप्रचारक हुए। यह वैष्णवभक्ति का युग था जिसमें शाक्त ब्राह्मणों, आहोम तथा कोच राजाओं की ओर से अवरोध भी उपस्थित किया जाता था। परन्तु धीरे-धीरे वैष्णव भक्ति से वे भी प्रभावित होते चले गये। शंकरदेव ने तो असमिया साहित्य ही नहीं बल्कि वहां के जनजीवन को ही एक नयी दिशा दी। उन्होंने भागवती धर्म चलाया। यह नाम श्रीमद्भागवत पुराण से लिया गया है। यह एकशरण धर्म के नाम से भी विख्यात है। कीर्तनघोषा शंकरदेव की प्रमुख रचना है। उनके नाम से अनेक ग्रंथ मिलते हैं। वह एक नाटकार भी थे। उनके नाटकों को अंकीया नाट कहा जाता है। इन नाटकों में एक ही अंक होते हैं। पहले अधिकांश गद्य में लिखे गये इन नाटकों में बरगीत नाम से पद्य का समावेश भी होता है।

वैष्णवकाल के दूसरे महान कवि हैं माधवदेव। नाम-घोषा उनकी प्रमुख रचना है। कवि अनन्त कन्दली, श्रीधर कन्दली और राम सरस्वती का भी बड़ा योगदान रहा। राम सरस्वती ने असमिया महाभारत की रचना की थी।

सोलहवीं शताब्दी में भट्टदेव ने असमिया गद्य साहित्य को विस्तार दिया।

उसके बाद गद्य, बुरंजी तथा अन्य साहित्य के विकास का काल आया। इस काल में धर्म से अलग साहित्य की रचना होने लगी जो पहले के धार्मिक साहित्य से अलग था।

बुरंजी साहित्य अज्ञात कथाओं का भंडार है। टाइ से आये बुरंजी शब्द का अर्थ भी यही है। इनमें इतिहास भी था क्योंकि आहोम समुदाय में इतिहास लिखने की परम्परा थी जो पुरोहित वर्ग किया करता था। परन्तु इस बुरंजी काल में पुरोहित वर्ग से यह काम राजकर्मचारियों के हाथों आ गया। यह एक प्रकार से आधिकारिक इतिहास है जिसके अनेक लेखक अज्ञात हैं। सूर्यखरी बलदेव तथा रविकान्त द्विज की राजवंशावलियां भी उल्लेखनीय हैं। कविराज चक्रवर्ती तथा धर्मदेवभट्ट अन्य महत्वपूर्ण कवि हुए। इस अवधि में साहित्य ही नहीं बल्कि ज्योतिष, आयुर्वेद, गणित आदि विभिन्न विषयों पर भी असमिया में काफी कुछ लिखा गया।

असमिया साहित्य के आधुनिक काल में काफी बदलाव आया। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही आहोम राज कमजोर हो गया तथा 1817-18 में असम बर्मा के अधीन हो गया। सन् 1826 में असम अंग्रेजी शासन के अधीन हो गया। इससे असम का जनजीवन तथा उसकी सोच पर असर पड़ा। पूर्व में असमिया साहित्य को मिल रहा राजकीय आश्रय समाप्त तो हुआ ही मठों आदि से भी सहयोग कम हो गया। फलतः साहित्य रचना धीमी हो गयी। उस समय बंगाली काफी संख्या में अंग्रेजी शासन में अधिकारी तथा कर्मचारी बनकर आये। उन्होंने अंग्रेजों से कहा कि असमिया एक स्वतंत्र भाषा नहीं है बल्कि बंगाली का ही एक रूप है इसलिए राजकाज या विद्यालयों में उसे स्थान नहीं दिया जाना चाहिए। अंग्रेजों ने 1836 से असमिया को बहिष्कृत कर दिया।

उसके बाद असमिया शिक्षित समुदाय ने असमिया को अलग भाषा के रूप में स्थापित करने का काम प्रारम्भ किया। ईसाई मिशनरियों के पादरियों, विशेषकर अमेरिकी पादरियों, ने धर्म प्रचार के लिए असमिया का ही सहारा लिया जिससे इस आन्दोलन को बल मिला। पादरियों ने छापाखाना खोले तथा असमिया ग्रंथ छापने प्रारम्भ कर दिये। सन् 1813 में बाइबल का असमिया अनुवाद प्रकाशित हुआ जो असमिया का पहला छपा हुआ ग्रंथ है। सन् 1846 में पहला असमिया मासिक पत्र अरुणोदइ का छपना प्रारम्भ हो गया। अंग्रेजी सरकार को इस आन्दोलन के कारण 1873 में असमिया को अपने स्थान पर प्रतिष्ठित करना पड़ा। असमिया में काम करने वाले प्रमुख पादरी थे माइल्स ब्रनसन, ब्राउन, श्रीकाटर और केरे।

इस काल में पाश्चात्य सोच के आधार पर असमिया साहित्य का स्वरूप उभरता गया। आनन्दराम ढेकियाल फुकन इस काल के एक प्रमुख लेखक थे। गुणाभिराम बरुवा इतिहासकार तथा गद्य लेखक के रूप में विख्यात हुए।

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में कलकत्ता के कालेजों में पढ़ने वाले छात्रों ने भी जोनाकी नामक एक असमिया पत्रिका निकाली। असमिया साहित्य में इसमें लिखने वाले साहित्यकारों को जोनाकी समूह के नाम से जाना जाता है। उनमें प्रमुख थे - लक्ष्मीनाथ बेजबरुवा, हेमचन्द्र गोस्वामी, चन्द्र कुमान आगरवाला, तथा रजनीकान्त बरदलै।

कमलाकान्त भट्टाचार्य एक दार्शनिक कवि हुए। हितेश्वर बरुवा ने मुक्तक तथा सॉनेट लिखे। प्रकृति के कवि हुए विहगी कवि रघुनाथ चौधरी। दुर्गेश्वर शर्मा ने दार्शनिक रहस्यवादी कविताओं की रचना की। विद्रोही कवि के रूप में विख्यात हुए अम्बिका गिरिराय चौधरी तथा प्रसन्नलाल चौधरी। मफिजुद्दीन अहमद ने सूफी रचनाएं कीं। महिला कवियों में धर्मेश्वरी देवी, नलिनीबाला देवी तथा पद्मावती देवी प्रमुख थीं।

शरतचन्द्र गोस्वामी, लक्ष्मीधर शर्मा, लक्ष्मीकांत फुंकन, तथा सैयद अब्दुल मलिक महत्वपूर्ण लेखक हुए। अम्बिकानाथ बरा, वाणीकान्त काकती, कालीराम मेधी, विरंचि बरुवा तथा डिम्बेश्वर नेओग प्रमुख आलोचक थे।

अन्य सभी भाषाओं की तरह पत्र-पत्रिकाओं ने असमिया साहित्य के विकास में बहुत योगदान किया। दूसरे महायुद्ध के समय अमूल्य बरुवा ने प्रगितिशील कविता की रचना प्रारम्भ की।

स्वातंत्र्योत्तर काल में असमिया साहित्य का और विकास हुआ। नये प्रकार का साहित्य सृजित किया जाने लगा। हेम बरुवा, नवकान्त बरुआ, हरिवर काकती, वीरेन्द्र भट्टाचार्य, महेन्द्र बरा, होमेन बरगोहांइ आदि प्रमुख कवि हुए। योगेश दास, अब्दुल मिलक, वीरेन्द्र भट्टाचार्य, चन्द्रप्रकाश शइकीया आदि प्रमुख कहानी लेखक हुए। उपन्यास लेखकों में प्रमुख हैं हितेश डेका, तिलकदास, वीरेन्द्र भट्टाचार्य, राधिकामोहन गोस्वामी, प्रफुल्लदत्त गोस्वामी, और मुहम्मद पियार। प्रमुख नाटककार हैं लक्ष्यधर चौधरी, अतुल हजारिका, दैव तालुकदार, ज्योतिप्रसाद आगरवाला, और नकुलचन्द्र भूजा आदि। आलोचना के क्षेत्र में सत्येन्द्रनाथ शर्मा, महेश्वर नेओग, श्रीतीर्थनाथ शर्मा, हेम बरुवा, प्रफुल्लदत्त गोस्वामी और विरिचिकुमार बरुआ का विशेष योगदान माना जाता है।

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