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वर वधू मिलान में अष्टकूट या अष्टगुण विचार निम्न आठ गुणों पर प्राय: प्रचलन में है -

1. वर्ण
2. वश्य
3. तारा
4. योनि
5. ग्रह मैत्री
6. गण
7. भकुट, तथा
8. नाड़ी

इन सभी के लिए अंक क्रमश: निर्धारित हैं, जो इनके गुणों के अंक है। इन गुणों के अंकों ( एक से लेकर आठ तक का योग 36 होता है। इनके योग से जो प्राप्त अंक होता है उसे वर-वधु के गुणों के मिलान के बाद का कुल गुण कहा जाता है। इस तरह यदि किसी वधु के गुणों के वर के गुणों से मिलान के बाद कुल योग 30 आया तो कहते हैं कि वधु के वर से 30 गुण मिल गये।

अष्टगुण गणना के पश्चात्

अष्टगुण या अष्टकूट गणना के पश्चात् सभी कूटों के लिए प्राप्त अंक को जोड़ना चाहिए। जोड़ने से जो अंक प्राप्त होता है उसे वर-वधु के कुल गुण कहा जाता है।

यदि भकुट के गुण मिलते हों तो
कुल गुण 16 से कम आये तो वैसा विवाह निन्द्य है।
16 से 20 तक के गुण को मध्यम माना जाता है।
20 से 30 तक श्रेष्ठ तथा उससे अधिक गुण मिलने पर अतिश्रेष्ठ समझा जाता है।

यदि भकुट गुण नहीं मिलते हों तो
20 से कम गुण मिलने पर निन्द्य
20 से 25 तक मध्यम
25 से 30 तक श्रेष्ठ तथा उससे अधिक गुण मिलने पर अतिश्रेष्ठ समझा जाता है।

स्पष्ट है कि भकुट का विशेष महत्व है। ग्रह मैत्री भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि इन दोनों में से एक भी पूर्ण शुभ हो तो एक-दूसरे के दोष का परिहार हो जाता है।

अनेक विद्वानों के अनुसार योनि का अनुकूल होना आवश्यक है क्योंकि योनि का प्रभाव दाम्पत्य सुख-भोग की प्रवृत्ति एवं सन्तान के स्वास्थ्य और उनकी आयु पर पड़ता है।

परन्तु कुछ विद्वानों का मत है कि सद्भकुट तथा ग्रह मैत्री होने पर योनि दोष का प्रभाव समाप्त हो जाता है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि तारा, ग्रह मैत्री एवं भकुट तीन महत्वपूर्ण विचारण के बिंदु हैं। अनेक विद्वानों के अनुसार यदि इन तीनों का पूर्ण गुण मिलते हों तो अन्य कूटों का विचारण किये बिना विवाह करना शास्त्र सम्मत है। इन तीनों के गुण मिलाकर 15 होते हैं। चूंकि गणना में न्यूनतम 16 गुण मिलने पर विवाह करने की अनुमति शास्त्र दे देते हैं, इसलिए विद्वानों का यह विचार मान्य लगता है।

ब्राह्मण वर्ण के लिए नाड़ी, क्षत्रिय के लिए वर्ण, वैश्य के लिए गण एवं शूद्र के लिए योनि का विचार अलग से करना और दोष होने पर बिना परिहार के विवाह न करने का ही विधान है। यदि परिहार नहीं मिलता हो तथा कुल गुण भी 16 से कम हों तो विवाह वर्जित है।

वश्य, तारा, ग्रह मैत्री एवं भकुट ये चार सभी वर्णों के लिए विचारणीय हैं। वश्य नहीं मिलने का दोष तारा मिलने पर, तारा नहीं मिलने का दोष भकुट मिलने पर, तथा भकुट नहीं मिलने का दोष एकाधिपत्य या राश्यांश या ग्रह मैत्री के गुण पूर्ण होने पर अप्रभावी हो जाता है। यदि वश्य, तारा, ग्रह मैत्री एवं भकुट के गुण पूर्ण हों तो सभी स्थितियों में विवाह किये जाने योग्य माना जायेगा। भकुट तथा ग्रह मैत्री में से किसी एक के गुण मिलने तथा 16 गुण या उससे अधिक होने पर सभी प्रकार के दोषों का परिहार हो जाता है। किन्हीं कारणों से यदि बिना कुंडली मिलाये विवाह करना हो तो केवल जन्म या नाम नक्षत्र से गणना मिलाकर इस नियम के अनुसार निर्णय लेकर विवाह की अनुमति दे देनी चाहिए।

यदि वर तथा कन्या दोनों की जन्मकुंडलियां उपलब्ध हों तथा उसी के अनुसार गणना कर रहे हों और उस समय ग्रह मिलान नहीं हो पाता, मंगली दोष का प्रतिकार नहीं हो पाता तो मुहूर्त चिंतामणि का सहारा लेना चाहिए। इसके अनुसार पहले वर-कन्या की ग्रह गणना मिलायें। यदि यह मिलता हो तभी आगे अष्टकूट गणना पर विचार करें अन्यथा नहीं। यदि ग्रह गणना उत्तम है तो 16 से भी कम गुण होने पर विवाह शास्त्र सम्मत माना जायेगा।

यदि केवल नक्षत्र राशि नाम या जिन नामों से वर तथा कन्या को इस लोक में आधिकारिक रुप से जाना जाता है, के आधार पर अष्टकूट गणना की गयी हो तो किसी भी स्थिति में 16 गुण से कम आने पर विवाह नहीं करना चाहिए। यदि 16 गुण से अधिक मिल गये परन्तु अन्य दोष हैं तथा उनका परिहार नहीं है, तब भी विवाह का सुझाव नहीं दिया जा सकता। ऐसे मामलों में यदि ग्रह मैत्री एवं भकुट दोनों में से एक भी न मिले, या तारा दोष हो एवं वश्य का गुण भी न मिलता हो विवाह शास्त्र सम्मत नहीं होगा।

यदि वर-कन्या दोनों की कुंडली उपलब्ध हो तो सर्वप्रथम मंगल एवं परस्पर ग्रह दोषों पर विचार करना चाहिए। यदि दोष मिले तो परिहार ढूंढ़ना चाहिए। यदि वर-कन्या का एक दूसरे पर समान रुप से दोष हो, या वर का कन्या पर केवल अल्प दोष ही अधिक हो (एक या दो) तब राजयोटक, विधियोटक, आयु तथा संतान का विचार किये बिना विवाह की अनुमति शास्त्र सम्मत नहीं है। यदि कन्या का वर पर दोष हो तो कन्या का प्रबल सौभाग्य योग, वर की आयु कन्या से अधिक होने, तथा राजयोटक, विधियोटक, जैसे विशेष योग मिलने पर विवाह की अनुमति देना शास्त्रानुकूल होगा। यदि वर का वश्य कन्या से बलशाली हो, एकाधिपत्य हो या पूर्ण मैत्री हो तब भी विवाह की अनुमति दी जा सकती है।

ग्रह गणना एवं अष्टकूट गणना के अतिरिक्त प्रश्न कुंडली तथा अंक ज्योतिष से भी गणना की जाती है।

अष्टकूट गणना के बाद चार अन्य स्वतंत्र कूटों पर भी विचार किया जाता है। उनके विचार सामान्यत: तभी किये जाते हैं जब अष्टकूट गणना से उत्पन्न संदेहों के कारण और अधिक चिंतन की आवश्यकता होती है। ये हैं नृदूर, युन्जा, वर्ग एवं तत्व गणना।

संसार में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं जिनमें गुण और दोष दोनों न हों। वर-वधु के गुण मिलाते समय केवल यह देखना होता है कि दोनों अपने-अपने गुण-दोषों के साथ सुखमय तथा सार्थक जीवन साथ-साथ जी सकेंगे या नहीं। अधिकांश मामलों में यह स्पष्ट दिखायी देता है, परन्तु अनेक बार निर्णय कर पाना असम्भव सा हो जाता है। वैसी स्थिति में किसी विद्वान् व्यक्ति से मिलें जो वर-वधु मेलापक के मामले के विशेषज्ञ हों।

ध्यान रहे कि भारतीय समाज में आठ प्रकार के विवाह प्रचलित रहे हैं। उनमें से केवल एक ब्राह्म विवाह के मामले में ऐसी गणना की जाती है। दैव विवाह का अब कोई प्रचलन नहीं है, आर्ष विवाह सम्पदा के लेन-देन तथा घोर सांसारिक कारणों के आधार पर किये जाने के कारण उसमें गणना का कोई आधार नहीं होता, प्रजापत्य तथा आसुर विवाह इस कलि युग में वर्जित है, गंधर्व विवाह (वर तथा कन्या द्वारा एक दूसरे का स्वयं चयन करना या प्रेम से वशीभूत होकर विवाह करना) में आकर्षण तथा निर्णय के कारण इन्द्रियों की दासता होते हैं जिनके अपने ही नियम हैं तथा जो इन ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर नहीं किये जाते। शेष दो राक्षस एवं पिशाच विवाह निकृष्ट हैं तथा गैर-कानूनी हैं इसलिए ऐसे विवाहों के लिए भी गणना का कोई प्रश्न नहीं उठता।

ऐसी गणना तब की जाती है जब अन्य सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक आदि अन्य आधारों पर वर तथा कन्या के परिवार के सदस्य विवाह करने के प्रति मन से पहले ही तैयार हो जाते हैं।


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