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अरविंद दर्शन

महर्षि अरविंद के दर्शन को अरविंद दर्शन के नाम से जाना जाता है।

अरविंद दर्शन के अनुसार ब्रह्म और जगत दोनों ही सत्य है तथा मनुष्य और जगत का सम्बंध उत्तरोत्तर विकास की प्रक्रिया है। यह जगत् निवर्तन-विवर्तन का जगत् है, अवरोहण-आरोहणात्मक है।

उनके अनुसार जड़ तथा चेतन दोनों ही सत्य है जिनके संयोग से जीवधारी का अस्तित्व है। इसलिए जड़ द्रव्य तथा आत्मा दोनों में से कोई भी उपेक्षणीय नहीं है। किसी एक की उपेक्षा करना एकांगी हो जायेगा जो हमारे हित में नहीं है।

उन्होंने कहा कि परमतत्व सत् चित् आनंद ब्रह्म है। विशुद्ध सत् ही मूल तत्व है। वह निर्गुण और सगुण, एक और अनेक, स्थाणु और गतिशील सबकुछ है।

वह मानते हैं कि जगत् की सत्ता शिव का आनन्द नृत्य है।

वह कहते हैं कि उनका योग समग्र मानवता के कल्याण के लिए है, व्यक्तिगत सिद्धि या मुक्ति के लिए नहीं। उनके योग के अंग हैं - सम्पूर्ण आत्मसमर्पण, सर्वत्र भगवद् दर्शन, द्रष्टा भाव, तथा स्वयं में भावगत प्रक्रिया को विकसित होने देना। उनकी साधना पद्धति है भक्ति, ज्ञान और कर्म का समन्वय।


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