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अनुप्रास

अनुप्रास एक शब्दालंकार है। इसमें वर्णों या व्यंजनों का साम्य प्रस्तुत किया जाता है। अर्थात् वर्णों का प्रयोग बार-बार किया जाता है।

भिखारीदास ने कहा कि अनुप्रास रसों को विभूषित करनेवाले गुणों के भूषण हैं तथा शब्दों के आदि अन्त के अक्षरों की आवृत्ति से बनते हैं।

आदिकाल में रस की अनुरूपता के लिए, रीतिकाल में चमत्कार एवं शाब्दिक वैचित्र्य के लिए, तथा भक्ति काल में सहज भावात्मक प्रवाह के लिए अनुप्रास का प्रयोग मिलता है।

अनुप्रास का महत्व बताने के लिए भोज (ई पू 11वीं शताब्दी) ने लिखा कि जिस प्रकार चन्द्रमा को ज्योत्सना, कामिनी को लावण्य शोभीत करता है, उसी प्रकार अनुप्रास काव्य को।

भोज ने 12 अनुप्रास वृत्तियों का उल्लेख किया है - कर्णाटी (क वर्ग की आवृत्ति), कौन्तली (च वर्ण की आवृत्ति), कौंकी (ट वर्ग की आवृत्ति), कौंकणी (त वर्ग की आवृत्ति), वाणवासिका (प वर्ग की आवृ्त्ति), द्राविणी (अन्तस्थ वर्णों - य र ल व की आवृत्ति), माथुरी (ऊष्म वर्णों - श ष स की आवृत्ति), मात्सी (दो तीन वर्णों के अनुप्रास), मागधी (दो वर्गों में से एक वर्ग को विदर्भी की शोभा से युक्त करने वाली), ताम्रलिप्तिका (अपने वर्ग के अन्त्य वर्ण से युक्त), औड़ी (अपने रूप सौंदर्य से चित्त को सर्वस्वरूप से हरण करने वाली) तथा पौंडी (अंशरूप संयोग से चित्त को ग्रथित करने वाली)।

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