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अनिश्चयात्मक आलोचना प्रणाली

अनिश्चयात्मक आलोचना प्रणाली वह आलोचना प्रणाली है जिसमें कहा गया कि निर्णय हमें कभी भी सत्य तक नहीं ले जा सकते।

इस आलोचना प्रणाली के मानने वालों ने साहित्य की आलोचना के तीन बिन्दुओ - रसग्रहण, व्याख्या तथा निर्णय को अपर्याप्त कहा एवं इस बात पर बल दिया कि निर्णय प्रकारान्तर में सत्य के अनेक बिन्दुओं की उपेक्षा का शिकार हो जाता है। इसलिए निश्चयात्म के स्थान पर आलोचना अनिश्चयात्मक होनी चाहिए ताकि सत्य के मूल तक पहुंचने में सहायता मिले।

अनिश्चयात्मक आलोचना प्रणाली के आलोचकों ने मुख्यत तीन प्रश्न उठाये।

पहला, निर्णय का मानदंड कौन स्थिर करेगा?
दूसरा, निर्णय के मानदंड क्या होंगे, वैसी स्थिति में जब सबकुछ सापेक्षिक है अर्थात् किसी को नीति, किसी को अनुभूति और किसी को अभिव्यंजना अधिक महत्वपूर्ण लगता है?
तीसरा, निर्णय देने वाला क्या निर्वैयक्तिक होकर अर्थात् पूर्णतः पूर्वाग्रहमुक्त होकर मूल्यांकन कर सकता है?

साहित्य में यह आलोचना प्रणाली बहुत बाद में जाकर विकसित हुई।

वर्जीनिया वुल्फ, हर्बर्ट रीड आदि अंग्रेजी के तथा नंददुलारे वाजपेयी, अज्ञेय, धर्मवीर भारती आदि हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक इसी अनिश्चयात्मक आलोचना प्रणाली के पुरोधा के रूप में जाने जाते हैं।

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