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अधीरा

अधीर नायिकाओं को अधीरा कहा जाता है। ऐसी नायिकाएं अपने भटके हुए पतियों जिनके अन्य स्त्रियों से संसर्ग होते हैं से प्रकट रूप से कोप करती हैं। ये कटु वचन कहते हुए अपने पतियों का अनादर करती हैं।

अधीरा नायिकाओं के पांच प्रकार हैं - मध्या अधीरा, प्रौढ़ा अधीरा, धीरा अधीरा, मध्या धीरा अधीरा, तथा प्रौढ़ा धीरा अधीरा।

मध्या अधीरा नायिकाएं पति का अनादर करते हुए अपना कोप प्रकट करती हैं। मतिराम ने ऐसी नायिका के वचनों को एक कविता में इस प्रकार व्यक्त किया -
कोउ नहीं बरजै मतिराम रहो तितही-जितही मन भायो।
काहे कौं सौहै हजार करौ तुम तौ कबहूं अपराध न ठायो।

प्रौढ़ा अधीरा गरजन-ताड़न के साथ रोष प्रकट करती है।

धीरा अधीरा कोप गुप्त भी रहता है और प्रकट भी।

मध्या धीरा अधीरा नायिका का आक्रोश तीखा होता है। क्रोध के साथ व्यंग्य भी होता है। गुस्से में रोती भी हैं तथा रोष भी जताती हैं।

प्रौढ़ा धीरा अधीरा नायिकाएं वक्रोक्ति तथा भय प्रदर्शन से पति को दुःखी करने वाली तथा मानपूर्वक रति कला से उदासीन रहने वाली होती हैं। ये रूखा व्यवहार करती हैं।