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अधिनायकवाद

अधिनायकवाद एक राजनीतिक विचारधारा है जिसमें माना जाता है कि राष्ट्र की आत्मा अन्ततोगत्वा किसी अधिनायक के रूप में प्रकट होती है। इसमें कहा जाता है कि अधिनायक परिस्थितियों के कारण स्वयमेव प्रकट हो जाता है। ऐसा अधिनायक अपने सहायक चुन लेता है। उसकी शक्ति का प्रवाह ऊपर से नीचे क्रमबद्ध होता है। यह अधिनायक राष्ट्र या राज्य के समान ही शुभाशुभ या नैतिकता-अनैतिकता से परे हो जाता है। वह जो भी निर्णय करता है उसे ही ठीक तथा स्थायी माना जाता है तथा व्यवहार में राष्ट्र के नाम पर जनता उसी अधिनायक के प्रति आत्मसमर्पण कर देती है।

अधिनायक को प्रभुत्व की अदम्य इच्छा होती है जो इनकी पहचान है। इसी इच्छाशक्ति को वह मानव का सर्वश्रेष्ठ गुण मानता है और प्रभुत्व के लिए वह कुछ भी करता है। उसकी नैतिकता का आधार उसकी शक्ति ही है, अर्थात् शक्तिशाली जिसे नैतिकता कहता है वही नैतिकता है आदि।

अधिनायक के समक्ष किसी अन्य विचारधारा का कोई महत्व नहीं। उसकी अपनी विचारधारा होती है तथा उसके आगे और किसी विचारधारा को वह बर्दाश्त नहीं करता। जनतंत्र उसकी नजर में सामूहिक अनुत्तरदायित्व से अधिक कुछ भी नहीं। उसे व्यक्ति-व्यक्ति में समता या साम्यभाव से घृणा होती है क्योंकि वह मानता है कि कोई श्रेष्ठ है तथा कोई नीच। उसे यह स्वीकार नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति के मत को केवल एक मत गिना जाये। वह कानून की नजर में सभी बराबर हैं, जैसी अवधारणा का कट्टर विरोधी होता है।

ऐसा अधिनायक अपनी असाधारण योग्यता तथा बुद्धि के बल पर सोचता है कि केवल वही राष्ट्र का कल्याण कर सकता है। बहुसंख्यक तो उसकी नजर में शक्ति और बुद्धि से हीन होने के कारण राष्ट्र का कल्याण कर ही नहीं सकता।


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