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अतियथार्थवाद वह प्रवृत्ति है जिसमें मन की असंगत कल्पनाओं, स्वप्नों, दिवा-स्वप्नों, अतिकल्पनाओं आदी को भी स्थान मिलता है।
इसका प्रादुर्भाव फ्रांस में कला के क्षेत्र में हुआ था। प्रथम महायुद्ध (1916) काल के बाद इसका अत्यधिक जोर रहा। साहित्य तथा चित्रकला का नया दौर शुरु हुआ। इसकी औपचारिक स्थापना 1920 में हुई मानी जाती है।
अतियथार्थवादियों ने वास्तविकता तथा यथार्थ का अर्थ सर्वमान्य भौतिक एवं मानव प्रकृति में नहीं बल्कि उसके विपरीत जीवन की विकृतियों में खोजना प्रारम्भ किया। अतियथार्थवादी अनुभव अपनी प्रकृति में मुख्यतः मानसिक विकृतियों से सम्बंधित रहे हैं।
माना जाता है कि रोमांटिक और प्रकृतिवादी साहित्यकारों के पलायनवाद के विरोध में इसका जन्म हुआ। परन्तु इसके आने के पहले एक और दौर रहस्यवादी अनीश्वरवाद का था जिसे अतियथार्थवाद का वास्तविक उद्गम माना जाता है।
इसके उद्देश्यों और सिद्धान्तों पर सन् 1924 में आन्द्रे व्रेतन द्वारा दो घोषणापत्र प्रकाशित किये गये थे।
आज यह अतियथार्थवाद विश्वव्यापी हो गया है।
जो कुछ परम्परा में है, जो कुछ प्राचीन है, और जो कुछ रूढ़ियों और व्यवस्थाओं में बंधा हुआ है उन सबको समूल नष्ट कर देना ही अतियथार्थवाद का मुख्य उद्देश्य है। कला में अतिबौद्धिकता का यह विरोधी है तथा जीवन के एकान्त काल्पनिक पक्ष की प्रस्तुति का समर्थक। मानव अन्तर्विरोध का चित्रण एवं प्रचलित नैतिक मान्यताओं का विरोध इनकी कलाओं और साहित्य में स्पष्ट है। अतियथार्थवाद के अपने नैतिक मूल्य हैं जो प्रेम और स्वतंत्रता पर आधारित है। अन्य मूल्यों को यह खोखला मानता है।


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