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भारतीय वाङमय में ब्रह्म को शरीर के अन्दर निवास करने वाला भी माना गया है जिसे अपने आप में सम्पूर्ण, रुप-रस-गंध-श्रवण-स्पर्श का आश्रयस्थल, सर्वज्ञ और सर्वव्यापी भी कहा गया है।
अपने लघु स्वरुपों में से एक स्वरुप का आकार अंगुठे के आकार के बराबर होकर वह ब्रह्म हृदय-कमल-वासी है।
अनेक संत और विद्वान इसे ही जीवात्मा मानते हैं और इसे ही जीवब्रह्म।

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