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स्वतंत्रता एक महान परिकल्पना है और सम्पूर्ण जगत इसे पाने के लिए प्रयत्नशील। सभी प्रकार की निर्भरता से मुक्ति तथा ईच्छा शक्ति के स्वयं अपने निर्णय के अनुरुप काम करने की शक्ति को स्वतंत्रता कहा जाता है।
इस प्रकार सभी प्रकार के बंधनों से मुक्ति ही वास्तविक स्वतंत्रता है। यदि किसी भी अन्य पर निर्भरता बनी रहे तो उसे स्वतंत्रता नहीं कहा जा सकता। परन्तु ऐसी परम स्वतंत्रता का अस्तित्व नहीं है। इसलिए स्वतंत्रता को सापेक्ष मान लिया गया।
मानव की किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता का अर्थ समाज के सन्दर्भ में जब लिया जाता है तो उसे सामाजिक स्वतंत्रता कहा जाता है। ऐसी स्वतंत्रता राजनीति तथा समाजशास्त्र का अंग है जिनमें इनका अध्ययन किया जाता है।
धर्म में मोक्ष की परिकल्पना इसी स्वतंत्रता की भावना के कारण आयी। योगियों के अनुसार ईच्छा शक्ति को ज्ञानेन्द्रियों की दासता से मुक्त करा दिया जाता है तो उसे ही मोक्ष कहते हैं। परन्तु शारीरिक रुप से जीव मुक्त नहीं हो पाता क्योंकि शरीर आध्यात्मिक वस्तु नहीं बल्कि सांसारिक है, जो अस्तित्व के नियमों से बंधा है।
स्वतंत्रता के विविध रुप हैं और इसकी विविध परिकल्पनाएं।

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