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धर्म

धर्म वह सत्य है जिसके होने से ही यह जगत है। उसी एक सत् या धर्म के बारे में कहा गया - धर्म धारयते जगत्। उसी महत तत्व का स्वलक्षण ही धर्म है। वह अपने आप ही अस्तित्व में है, वह अनिवार्य अस्तित्व है। वह साक्षात् धर्म ही है। उनके सभी नियम धर्म ही माने जाते हैं, तथा उन नियमों के अनुकूल मानव व्यवहार के नियम मनुष्यों ने बनाये, और उनको भी धर्म कह दिया गया।

श्रुति (वेद), स्मृति, सदाचार, तथा जो स्वयं को प्रिय हो वैसे कार्यों को ही दूसरों के लिए करना धर्म कहा जाता है। मनु ने इन्हें साक्षात् धर्म ही कहा है तथा धर्म और अधर्म का विचार करने के लिए इन्हीं चार साक्षात् लक्षणों को आधार मानने को कहा है।

परन्तु धर्माचरण के मामले में मनु ने धर्म के दश लक्षण बताये हैं -
धृतिः क्षमा दमोsस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्।
धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य तथा अक्रोध, ये धर्म के दस लक्षण हैं।

श्रुति या वेद सम्मत का अर्थ है ज्ञान सम्मत।
स्मृति सम्मत का अर्थ है पूर्व संकलित ज्ञान अर्थात् वेद के आधार पर जो अन्य सिद्धान्त या नियम बनाये गये हैं उनके सम्मत।
सदाचार का अर्थ है वैसा व्यवहार जो सद्गुणों पर आधारित हो।
स्वयं को प्रिय का अर्थ है वे कार्य जो स्वयं के लिए किया जाना अच्छा लगे। अर्थात् किसी के द्वारा अन्याय किया जाना स्वयं को प्रिय नहीं है इसलिए किसी पर अन्याय नहीं करना है।

इस प्रकार भारतीय चिंतन परम्परा में जो पक्षपात रहित न्याय, सत्य का ग्रहण, तथा असत्य का त्याग है वही धर्म है। जो इसके विपरीत है वह अधर्म है।

धर्म अपने मूल स्वरूप में सनातान है, क्योंकि यह न तो कभी सृजित हुआ तथा न ही कभी इसका अन्त होगा। इसका कारण है कि जो सत् है, जिसका अस्तित्व स्वयं में है, जो अस्तित्व अनादि तथा अनन्त है, जिसके होने से ही सबकुछ है, उसी के नियमों को पाकर या जानकर उसी के अनुरूप चलने को ही धर्म कहते हैं। इस सनातन के बारे में ही उपनिषदों में कहा गया है है - एकं सत्यं, विप्राः बहुधा वदन्ति, अर्थात् सत्य एक है जिसे विप्र अर्थात् ज्ञानवान लोक अनेक प्रकार से बतलाते हैं। यही धर्म सनातान है तथा यही सनातन धर्म है। अर्थात् इस धर्म का सृजन नहीं हुआ बल्कि यह उस स्वयंभू सत्ता या सत् के अस्तित्व से साथ स्वयं ही अस्तित्व में है जिसे समय समय पर हमारे ऋषियों ने जाना तथा हमें बताया।

पदार्थों का स्वरूप
बौद्ध मतानुसार पदार्थों के स्वरूप को भी धर्म कहा जाता है। उनके अनुसार सम्पूर्ण जगत क्षणिक पदार्थों का संघात है। जब वे कहते हैं कि धर्म से ही जगत की उत्पत्ति हुई है, तब धर्म से उनका तात्पर्य है सभी सूक्ष्म पृथग्भूत तत्व, जो भूत और चित्त में निहित होते हैं, और ये ही जगत की उत्पत्ति के हेतु हैं। पदार्यों के स्वलक्षण या धर्म परस्पर मिलकर किसी दूसरे पदार्थ को उत्पन्न करते हैं। सभी धर्म कारण-कार्य नियम की व्यवस्था से नियमित होते हैं।
वसुबन्धु ने आकाश, प्रतिसंख्यानिरोध, तथा अप्रतिसंख्यानिरोध के अतिरिक्त सभी धर्मों के चार लक्षण बताये हैं। ये हैं - जाति, जरा, स्थिति, तथा अनित्यता। सभी धर्म स्वलक्षण (एक साथ एक ही धर्म का होना), क्षणिक तथा पृथग्भूत, अनात्म, एवं परस्पर व्यतिरिक्त हैं, फिर भी ये कारण-कार्य नियम से बंधे हैं, जिसे प्रतीत्यसमुत्पाद कहते हैं। अविद्या के कारण जगत का कारण-कार्य व्यवहार तेजी से बदलता है परन्तु प्रज्ञा से यह निरुद्ध होता है, और यही निरोध बुद्धत्व का सूचक है।
इस मत में धर्म के तीन प्रकार बताये गये हैं - सास्रव (मलिन), अनास्रव (मलरहित), तथा सास्रवानास्रव।
वैभाषिक (सर्वास्तिवादी) इन धर्मों का वर्गीकरण दो प्रकार से करते हैं - विषयगत तथा विषयिपरक।
विषयगत वर्गीकरण में संस्कृत तथा असंस्कृत (अनुत्पन्न, अर्थात् हेतु-प्रत्ययों से उत्पन्न संस्कृत धर्मों से व्यतिरिक्त धर्म) के भेद से धर्म द्विविध बताये गये हैं। ये संख्या में तीन हैं - प्रतिसंख्यानिरोध, अप्रतिसंख्यानिरोध, तथा आकाश। हेतु-प्रत्यय-सम्भूत को संस्कृत धर्म कहा जाता है। इनके सामान्य धर्म हैं - जाति, जरामरण, स्थिति, अनित्यता (क्षणिकत्व), तथा स्वलक्षण। रूप, चित्त, चैतसिक या चैत्त, तथा चित्तविप्रयुक्त के भेद से ये चार प्रकार के हैं। ये रूप ग्यारह हैं - पांच ज्ञानेन्द्रियां, उनके विषय, तथा अविज्ञप्ति।
सौत्रान्तिक और विज्ञानवादी भी इस विभाजन को थोड़े हेर-फेर के साथ स्वीकार करते हैं।

योगाचार
योगाचारी केवल चित्त या विज्ञान की सत्ता मानते हैं तथा समस्त बाह्य जगत को चित्त की ग्राह्य-ग्राहकवासना का विकल्प।

शून्यवाद
शून्यवादियों ने इन समस्त धर्मों को प्रतीत्यसमुत्पन्न माना। इसी आधार पर उन्होंने धर्म को सापेक्ष, निःस्वभाव, तथा शून्य बताया।

सिद्ध परम्परा
सिद्धों ने जगत को क्षणिक धर्मों का संघात माना, परन्तु इस माया के निर्माण को स्वप्न के समान अवास्तविक बताया। उनका कहना है कि जगत चित्तमय है। धर्म नैरात्म्य स्वभाव है जिसका अस्तित्व चित्त में ही है।

धर्म के दो भाग होते हैं - अध्यात्म तथा दर्शन
अध्यात्म वाले भाग में वे सभी प्रक्रियाएं आती हैं जिनका सम्बंध शरीर से है, तथा दर्शन वे सत्य हैं जिनके आधार पर चलने अथवा उनके साधर्म्य चलने का प्रयास होता है।

दुनिया के प्रमुख धर्म
सनातन धर्म, हिन्दू धर्म, मुस्लिम धर्म, ईसाई धर्म, यहूदी धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म, सिक्ख धर्म