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सम्पूर्ण ब्रह्मांड के सृजन, संचालान तथा इसकी निरन्तरता के पीछे जिस एकमात्र सत्ता को माना जाता है उसे ईश्वर कहते हैं, ऐसा दार्शनिकों, विद्वानों और सामान्य जनों द्वारा माना जाता है। विश्व भर की अधिकांश धार्मिक तथा गैर-धार्मिक परम्पराओं में ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार किया गया है।
प्रारम्भ में विश्व भर के प्राचीन काल के चिंतकों ने माना कि ब्रह्मांड के संचालन में अनेक ईश्वर हैं जिन्हें बाद में देवी-देवता कहा गया तथा एक ही ईश्वर की सत्ता को स्वीकार किया गया। विचारों में यह परिवर्तन मानवीय ज्ञान का एक बड़ा विकास था।
इसे ही एकेश्वरवाद कहा गया।
भारतीय चिंतन में उसी एक को सत् माना गया तथा सम्पूर्ण ब्रह्मांड और इसमे जो कुछ भी है उसे उसी की माया, या असत्। परन्तु वैसे विचारक रहे हैं जिनके अनुसार माया उनकी ही शक्ति है इसलिए यह भी सत् है, भ्रम नहीं।
बाद में आत्मा और परमात्मा का भेद किया गया, और द्वैतवाद का जन्म हुआ। कुछ विद्वान ऐसे हैं जिन्होंने आत्मा और परमात्मा को दो नहीं परन्तु एक माना और इस तरह अद्वैतवाद का जन्म हुआ।
ईश्वर सर्वत्र है तथा सर्वशक्तिमान है। उन्हें दयालु, अनादि, अनन्त, अगोचर आदि गुणों से सम्पन्न माना गया।
श्रीमद् भगवद गीता में कहा गया कि यहां जिस किसी का भी अस्तित्व है उन सबमें ईश्वर का ही वास है। इस प्रकार सबकुछ ईश्वर है, तथा ईश्वर के अलावा किसी अन्य का कोई अस्तित्व ही नहीं है।

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